सेलेब्रिटीज़, भारतीय समाज, और न्याय-व्यवस्थाI

भारतीय समाज जिन तानो-बानो से बुना है उसमें अपराध और अपराधी के लिए हमेशा से ही सुधार की गुंजाइश रही है। मसलन, हमारे यहाँ चोरी करने पर सीधे हाथ नहीं काट दिए जाते या फिर बलात्कार का दोषी पाए जाने पर विशेष अंग-विच्छेद का प्रावधान नहीं है, जैसा की अरब देशों में होता आया है। बल्कि, भारतीय कानून तो गवाहों और सबूतों के बिना पर सिर्फ जेल में डालता है या किन्ही ‘ररेस्ट ऑफ़ दी रेयर’ मुकदमों में फांसी की सज़ा सुनाता है।

हमारे क़ानून का फ़लसफ़ा है की हर अपराधी को सुधरने का एक मौका अवश्य मिलना चाहिए। परन्तु यह विडंबना ही है कि हमारी जेलों से निकलकर एक अपराधी और संगीन अपराध करने लगता है मानो उसे जेल में अधिक गंभीर अपराध की ट्रेनिंग मिली हो।न्याय व्यवस्था से जुड़ा एक और प्रचलित जुमला है कि ‘भले ही 100 अपराधी छूट जाएं, परन्तु किसी एक भी बेगुनाह को सज़ा नहीं होनी चाहिए।’

हाल ही में सलमान खान को 20 साल पुराने हिरन हत्या प्रकरण में 5 वर्ष कारावास की सजा सुनाई गयी जो ये इंगित करता है की आज भी भारत में क़ानून व्यवस्था सबके लिए सामान है, परन्तु ये क्या? 2 दिन बाद ही उसे जमानत पर रिहा भी कर दिया जाता है, जो इस बात की ओर भी इशारा करता है की इस ज़र्ज़र हो चुकी क़ानून व्यवस्था में कईं दरारे हैं जिनसे सलमान सरीख़े सेलिब्रिटीज के लिए अपने कुशल वकीलों की सहायता के बल पर निकल भागना बाएं हाथ का खेल है।

सदियों पहले उज्जयनी के राजा विक्रमादित्य अपनी न्याय परायणता के लिए विख्यात थे। वो एक ही क्षण में दूध का दूध और पानी का पानी कर देते थेI महाभारत काल में राजा युधिष्ठिर न्याय मूर्ति कहलाये। अकबर के नवरत्नों में से एक बीरबल हमेशा प्रयासरत थे की बादशाह द्वारा सबको न्याय नसीब हो और अगर उनको लगता था की कहीं अन्याय हुआ है तो वो अपनी सूझ-बूझ से बादशाह को न्यायोचित कदम उठाने के लिए प्रेरित करते। ऐसे न्यायप्रिय व्यक्तियों की सरजमीं पर कानून और न्याय-व्यवस्था वर्तमान काल खंड में मात्र एक कठपुतली बन कर रह गयी है।

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हमारे यहां ग्राम पंचायत का भी सन्दर्भ मिलता है जिसका उद्भव संभवतः प्राचीन और मध्यकाल के आस-पास हुआI उस समय पंचों को परमेश्वर की संज्ञा दी जाती थी और जब 200 वर्षों तक हमने ग़ुलामी झेली उस दौरान हमारी एक मात्र आस ये पंचायतें रहीं, क्यूंकि अंग्रेजों से न्याय मांगना सर्प से अमृत-दंश की इच्छा करना था, परन्तु उन पंचायतों से भी सबको न्याय मिलता होगा इसमें संशय है, क्यूंकि बल एवं रसूख़ का बोलबाला हमारे भारतवर्ष में प्राचीन काल से ही रहा हैI इन्हीं पंचायतों का विकृत स्वरुप हम आज खाप-पंचायतों के रूप में देखते हैं, जो अपनी हेकड़ी और बल के झूठे दम पर केवल अन्याय और अपराध करतीं हैं।

बहरहाल, हमारी न्याय पालिकाओं में सालों से करोड़ों केस पेंडिंग हैं, जबकि हज़ारों जजों के पद रिक्त हैं। मगर बदलाव का दम भरने वाले हुक्मरान को इससे क्या उसे तो एक और ‘टर्म’ चाहिए वो चुनावी वादे पूरे करने के लिए जो उसने प्रथम ‘टर्म’ मांगते हुए किये थे। न्याय की आस में गरीब और अभावहीन पीढ़ी दर पीढ़ी अपना घर, ज़मीन बेच कर भी एड़ियां घिसता रहता है, जबकि कानून इस नज़ारे को रसूकदारों और इन सेलेब्रिटीज़ की मखमल की जेबों से झांककर मजे लेता रहता है। यहाँ कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं-

“मैं भारत का कानून हूँ, मेरी फ़रियाद सुनो।

कैद पड़ा हूँ दफ्तरों में, साँसे मजबूर है चलने को,

चलता साथ उसी के हूँ जो रिश्वत दे चलाने को।

मैं खुद ही पंगु हूँ, मरणासन्न-सा पड़ा हुआ हूँ।

मैं भारत का कानून हूँ।”

One thought on “सेलेब्रिटीज़, भारतीय समाज, और न्याय-व्यवस्थाI

  • April 9, 2018 at 11:00 pm
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    Aapke vyagtigat vichoro se mai sahmat hu..
    Lekin durbhagya hai is desh ka or bhartiya savindhan ki lachhari hai ki Mujrim usko apne hisab se tod marod leta hai. Hame iske liye kuch kathor kadam oothane hoge, Jis se ki hum ek achha desh bana ske.

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