सिनेमा और जीवन में डिजिटलीकरण का विध्वंसI

श्री अमिताभ बच्चन साहब ने हाल ही में कहा की फिल्मों में डिजिटल प्रभाव के बढ़ने से फिल्मों का ‘चार्म’ ख़त्म हो गया है। शायद उनका इशारा ‘टाइगर ज़िंदा है’ और हालिया रिलीज़ ‘बाग़ी 2’ जैसी नितांत एक्शन फिल्मों की और था। तकनीकी विद्या के विकास ने मानव कल्पना को नयी परवाज़ दी है, इसमे कोई दो राय नहीं है और तकनीकी समावेश से आज कुछ भी संभव है, परन्तु ये भी एक कटु सत्य है की इसी ने फिल्मों की गहराई पर चोट भी की है।

तकनीकी अति ने न सिर्फ फिल्मों, बल्कि मनुष्य जीवन को भी उतनी ही क्षति पहुंचाई है। तकनीकी घुसपैठ ने हमे बहाने तो खूब दिए हैं ‘टच’ में रहने के, परन्तु मनुष्य इसकी अति से असली ‘टच’ ही भूल-सा गया है। हम आज तकनीक की अज़गरी गिरफ्त में हैं और हमारी भावनाएं हाशिये पर। फ़ोन, इंटरनेट, सेटेलाइट ने दूरियों को कम ज़रूर किया है, मगर अफ़सोस ये भावनाओं का संचार करने में विफल रहीं हैं। हालांकि बाज़ार और हुक्मरानो ने इस तकनीकी तलवार को भली भाँती भाँजा है और कुछ इस तरह का खेल रचा है मानो पहले हुक्मरान इस तलवार से पेट चीरता है और फिर बाज़ार की और संकेत करता हुआ कहता है की वहां मिलेगी इसकी दर्द-ए-दवा और बाज़ार तो सजा ही आपको लूटने के लिए है।

बहरहाल, हम जिसे आज स्पेशल इफेक्ट्स या SFX, SPFX और ख़ाली FX के नाम से जानते हैं, इसकी शुरुआत तो हॉलीवुड में 1895 में ही हो गयी थी जब अल्फ्रेड क्लार्क नामक एक फिल्मकार ने अपनी फिल्म Marry, Queen of Scots, में फिल्म की अभिनेत्री का सर कलम करने वाला दृश्य स्पेशल इफेक्ट्स के ज़रिये फिल्माया था।

उस घटना के बाद से तो जैसे प्रत्येक फिल्मकार इस होड़ में लग गया की तकनीकी सहायता से वो किस हद तक जा सकता है। सिनेमा में सन 1973 में आयी ‘वेस्टवर्ल्ड’ में पहली बार 2D विद्या का प्रयोग हुआ, परन्तु 1977 में आयी ‘स्टार वार्स’, जिसमें 3D तकनीक का सर्वप्रथम प्रयोग हुआ, ने सबको विस्मित कर दिया और बॉक्स ऑफिस पर अकूत धन कुटा। बस फिर क्या था, फ़िल्मकार इस प्रकार कहानी रचने लगे जिसमें रोंगटे खड़े करने वाले दृश्यों की भरमार हो और दर्शक उन्हें देख कर भोंचक्का रह जाये। ‘एलियन’ और ‘स्टार-ट्रेक’ इस दौर की कुछ श्रेष्ट फ़िल्में थीं।

नब्बे के दशक में तो कंप्यूटर क्रांति ने जैसे इस विद्या को हज़ारों पंख लगा दिए और इस दौर में आयी ‘डाई हार्ड’, ‘रोबोकोप’, तथा ‘टर्मिनेटर’ सरीख़ी फिल्मों ने सिनेमा को एक नयी ऊंचाई दी और दर्शकों का भी इन्हे भरपूर प्यार मिला। इसके पश्चात 1993 में आयी स्टीवन स्पीलबर्ग कृत ‘जुरासिक पार्क’ ने न सिर्फ कमाई के सारे रिकॉर्ड तोड़े बल्कि फिल्मकारों को अपनी कल्पना शक्ति को हज़ारों अश्वों के रथ पर सवार कर दिया। हालांकि, इस भेड़-चाल ने कईं फूहड़ फिल्मों को भी जन्म दिया और आज आलम ये है की स्पेशल इफेक्ट्स के जलसे में थोड़ी बहुत कहानी ठूंस दी जाती है। ‘ट्रांसफार्मर्स’ और ‘अवेंजर्स’ इसी श्रेणी में आती हैं।

आपको ‘सेव द वर्ल्ड’ ‘सेव द ह्यूमैनिटी’ का नारा लगभग हॉलीवुड की हर दूसरी फिल्म में मिलेगा मानो अमेरिका ने ही ठेका ले रखा हो मानव जाती को बचाने का। जबकि सत्य तो ये है की विश्व को तीसरे युद्ध की भयानक त्रासदी में धकेलने वाला यही देश होगा, क्योंकि हथियार बनाने और बेचने वाले विश्व के नंबर एक व्यापारी से और आशा ही क्या की जा सकती है। एक सर्वे ने उजागर किया था की जितनी तबाही अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान और ईराक में की उतनी तो दोनों विश्व युद्धों में नहीं हुयी थी, और हम बेवजह ही हिटलर को आज तक दूनिया का सबसे निर्मम शासक मानते आये हैं, जबकि यहाँ तो हर शाख पर उल्लू बैठा है। नंगा सत्य यही है की हम सब बारूद के ढेर पर बैठें है, बस एक चिंगारी की दरकार है।

बकौल राहत इंदौरी-

आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो, ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो।
राह के पत्थर से बढ़ कर कुछ नहीं हैं मंज़िलें, रास्ते आवाज़ देते हैं सफ़र जारी रखो।

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